Thursday, November 29, 2018

Relations and what spoken words can do

एक सहेली ने दूसरी सहेली से पूछा:- बच्चा पैदा होने की खुशी में तुम्हारे पति ने तुम्हें क्या उपहार दिया ?

सहेली ने कहा - कुछ भी नहीं!

उसने प्रश्न करते हुए पूछा कि क्या ये अच्छी बात है ?
क्या उस की दृष्टि में तुम्हारी कोई कीमत नहीं ?

*शब्दों का ये ज़हरीला बम गिरा कर वह सहेली दूसरी सहेली को अपनी टेंशन में छोड़कर चलती बनी।।*

थोड़ी देर बाद शाम के समय उसका पति घर आया और पत्नी का मुंह लटका हुआ पाया।।
फिर दोनों में झगड़ा हुआ।।
एक दूसरे को भला बुरा कहा।।
मारपीट हुई, और आखिर पति पत्नी में तलाक हो गया।।

*जानते हैं प्रॉब्लम की शुरुआत कहां से हुई ? उस व्यर्थ के बात से जो उसका हालचाल जानने आई सहेली ने कहा था।।*

रवि ने अपने परम मित्र  पवन से पूछा:- तुम कहां काम करते हो?
पवन- फला दुकान में।। रवि- कितनी सैलरी देता है मालिक?
पवन-18 हजार।।
रवि-18000 रुपये बस, तुम्हारा जीवन कैसे कटता है इतने पैसों में ?
पवन- (गहरी सांस खींचते हुए)- बस यार क्या बताऊं।।

*मीटिंग खत्म हुई, कुछ दिनों के बाद पवन अब अपने काम से नीरस हो गया।। और सैलरी बढ़ाने की डिमांड कर दी।। जिसे मालिक ने रद्द कर दिया।। पवन ने जॉब छोड़ दी और बेरोजगार हो गया।। पहले उसके पास काम था अब काम नहीं रहा।।*

एक साहब ने एक व्यक्ति से कहा जो अपने बेटे से अलग रहता था।...... तुम्हारा बेटा तुमसे बहुत कम मिलने आता है।। क्या उसे तुमसे प्यार नहीं हैं?
बाप ने कहा बेटा ज्यादा व्यस्त रहता है, उसका काम का शेड्यूल बहुत सख्त है।। उसके बीवी बच्चे हैं, उसे बहुत कम समय मिलता है।।

पहला आदमी बोला- वाह!! यह क्या बात हुई, तुमने उसे पाला-पोसा उसकी हर इच्छा पूरी की, अब उसको बुढ़ापे में व्यस्तता की वजह से मिलने का समय नहीं मिलता है।। तो यह ना मिलने का बहाना है।।

*इस बातचीत के बाद बाप के दिल में बेटे के प्रति शंका पैदा हो गई।। बेटा जब भी मिलने आता वो ये ही सोचता रहता कि उसके पास सबके लिए समय है सिवाय मेरे।।*

*याद रखिए जिह्वा से निकले शब्द दूसरों पर बड़ा गहरा असर डाल देते हैं।। यह सत्य है कुछ लोगों की जिह्वा से शैतानी बोल निकलते हैं।। हमारी दैनिक दिनचर्या में बहुत से सवाल हमें बहुत भोले-भाले से लगते हैं।।*

जैसे-
*तुमने यह क्यों नहीं खरीदा।।*
*तुम्हारे पास यह क्यों नहीं है।।*
*तुम इस व्यक्ति के साथ पूरा जीवन कैसे चला सकते हो।।*
*तुम उसे कैसे मान सकते हो।।*
वगैरा वगैरा।।

इस तरह के व्यर्थ के प्रश्न नादानी में या बिना तर्क के हम पूछ बैठते हैं।।
जबकि हम यह भूल जाते हैं कि हमारे ये सवाल सुनने वाले के हृदय में
घृणा या प्रेम का कौन सा बीज बो रहे हैं।।

आज के दौर में हमारे इर्द-गिर्द, समाज या घरों में जो टेंशन टाइट होती जा रही है, उनकी जड़ तक जाया जाए तो हमेशा उसके पीछे किसी और का हाथ होता है।।
वो ये नहीं जानते कि नादानी में या जानबूझकर बोले जाने वाली बातें किसी के जीवन को बरबाद कर सकती हैं।।

ऐसी हवा फैलाने वाले हम ना बनें।।

*लोगों के घरों में अंधे बनकर जाओ और वहां से गूंगे बनकर निकलो।।*

*(आंख बंद करके एक बार विचार अवश्य करें)*              🙏🏻 *धन्यवाद* 🙏

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